By Shivali Shrivastava
भोपाल: मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है—एक ऐसा मंच जो समानता, न्याय और समावेशन की बात करता है। लेकिन जब हम मीडिया संस्थानों के भीतर झांकते हैं, तो एक विरोधाभास साफ़ दिखाई देता है। न्यूज़रूम में महिलाओं की मौजूदगी बढ़ी है, उनकी आवाज़ मजबूत हुई है, पर नेतृत्व की कुर्सी अब भी उनसे कुछ कदम दूर है। यह दूरी किसी लिखित नियम की वजह से नहीं, बल्कि उन अदृश्य बाधाओं के कारण है, जिन्हें ‘काँच की छत (Glass Ceiling)’ कहा जाता है।
दिखती प्रगति, छुपी बाधाएँ
पिछले कुछ दशकों में भारत, खासकर मध्य प्रदेश में, महिला पत्रकारों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वे प्रिंट, टेलीविज़न, रेडियो और डिजिटल मीडिया में राजनीति, अपराध, समाज और विकास जैसे गंभीर विषयों को कवर कर रही हैं। बावजूद इसके, संपादकीय निर्णय लेने वाले पदों और नेतृत्व भूमिकाओं में उनकी भागीदारी सीमित बनी हुई है।मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में यह समस्या और गहरी हो जाती है, जहाँ सामाजिक संरचनाएँ, पारंपरिक लैंगिक भूमिकाएँ और संस्थागत ढाँचे एक-दूसरे से मिलकर महिलाओं की पेशेवर प्रगति को सीमित कर देते हैं। कई महिला पत्रकार मानती हैं कि योग्यता और अनुभव होने के बावजूद उन्हें नेतृत्व के अवसर नहीं मिलते।
दोहरी ज़िम्मेदारियों का दबाव
महिला पत्रकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल कार्यस्थल की नहीं है, बल्कि कार्यस्थल और परिवार—दोनों को संतुलित करने की है। अनियमित काम के घंटे, देर रात की ड्यूटी, सुरक्षित परिवहन की कमी और चाइल्डकेयर जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव उनके नेतृत्व के रास्ते को और कठिन बना देता है। छोटे शहरों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में सामाजिक अपेक्षाएँ इस दबाव को कई गुना बढ़ा देती हैं।शोध क्या कहता है?
मध्य प्रदेश के भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे शहरों में कार्यरत 120 महिला पत्रकारों पर आधारित इस अध्ययन में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए—- अधिकांश महिलाएँ नेतृत्व की भूमिका निभाने की आकांक्षा रखती हैं।
- बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने कार्यस्थल पर लैंगिक पक्षपात और असमान अवसरों की बात स्वीकार की।
- मेंटरशिप (मार्गदर्शन) की कमी एक प्रमुख बाधा के रूप में उभरी, और जहाँ मेंटर उपलब्ध हैं, वहाँ वे अधिकतर पुरुष हैं।
- कई संस्थानों में जेंडर-सेंसिटिव नीतियाँ कागज़ों तक सीमित हैं, उनका प्रभाव ज़मीनी स्तर पर कम दिखाई देता है।
यह भी सामने आया कि डिजिटल मीडिया में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक है, जो यह संकेत देता है कि नए मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पारंपरिक ढाँचों की तुलना में कुछ हद तक अधिक समावेशी हैं।
नेतृत्व की चाह, व्यवस्था की चुनौती
अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि महिला पत्रकारों की महत्वाकांक्षा में कोई कमी नहीं है। समस्या वहाँ पैदा होती है, जहाँ अवसर, समर्थन और निष्पक्ष मूल्यांकन की कमी होती है। जिन महिलाओं को लगता है कि उनके संस्थान में समान अवसर नहीं हैं, उन्हें नेतृत्व से जुड़ी चुनौतियाँ अधिक झेलनी पड़ती हैं।यह स्थिति न केवल व्यक्तिगत करियर को प्रभावित करती है, बल्कि मीडिया संस्थानों की गुणवत्ता और विविधता पर भी असर डालती है। शोध बताते हैं कि विविध नेतृत्व बेहतर निर्णय, संवेदनशील रिपोर्टिंग और समावेशी दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।
संघर्ष के बीच उम्मीद
इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, मध्य प्रदेश की महिला पत्रकार हार मानने को तैयार नहीं हैं। वे नए कौशल सीख रही हैं, आपसी नेटवर्क बना रही हैं और कई बार स्वतंत्र मीडिया पहलों की शुरुआत भी कर रही हैं। यह जुझारूपन इस बात का संकेत है कि बदलाव की ज़मीन तैयार हो रही है—बस संस्थागत समर्थन की ज़रूरत है।आगे का रास्ता
यदि मीडिया संस्थान वास्तव में समानता के मूल्यों को अपनाना चाहते हैं, तो उन्हें—- जेंडर-संवेदनशील नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा
- मेंटरशिप और नेतृत्व विकास कार्यक्रम शुरू करने होंगे
- कार्य-जीवन संतुलन को समर्थन देने वाली व्यवस्थाएँ विकसित करनी होंगी
- और सबसे ज़रूरी, नेतृत्व को केवल लिंग नहीं, योग्यता से जोड़ना होगा
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश की महिला पत्रकारों की कहानी संघर्ष और साहस—दोनों की है। वे नेतृत्व के लिए तैयार हैं, लेकिन व्यवस्था को अभी तैयार होना बाकी है। ‘काँच की छत’ को तोड़ना केवल महिलाओं की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे मीडिया जगत की सामूहिक ज़िम्मेदारी है। जब न्यूज़रूम भीतर से समान होगा, तभी समाज के लिए उसकी आवाज़ सच में न्यायपूर्ण कहलाएगी।(शिवाली श्रीवास्तव एक पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में सात वर्षों का अनुभव है। उन्होंने राजनीति, जेंडर, सामाजिक और समकालीन मुद्दों सहित विविध विषयों पर रिपोर्टिंग की है। इसके अतिरिक्त, वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में फैकल्टी के रूप में कार्य कर चुकी हैं। वर्तमान में वे पीएचडी स्कॉलर हैं।)
